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    Tere shahar me...

    तन्हा सारी रातों को गुज़रे तेरे
    शहर से जुगनुओं की रौशनी में
    ये फ़लक भी न था हमारे साथ
    क़ि तुम्हारी यादों के सिनेवार में
    कभी इधर कभी उधर भटक रहे थे
    तेरे शहरों की सड़कों ने कह दिया
    चलों ख़ैर ही सही ये मालूम हुआ
    इतनी कम थी जगह की हमारे लियें
    तुम्हारे शहर में रुकना भी बेहाल था
    हमारा गुज़रना भी इत्तेफाक था
    वरना दूर से ही चलें जाते तुम्हारे
    शहर से....
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