• niharikanilamsingh 31w

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    मेरे मुस्कानों के अंदर
    रोती एक विकल स्याही है
    जीवन का है क्या भरोसा
    ये तो बस मिटती स्याही है
    जाकर किशोर पंखो से पूछो
    तुमने क्या खोया, पाया क्या
    बढ़ते अरमानो में लिपटी
    दो सूखी रोटी खायी है
    जीवन पथ पर बढ़ते रहना
    कठिनाई से लड़ते रहना
    नन्हे कदमो के हाथों में
    चीखों की लड़ियाँ आयीं हैं
    बढ़ते जाना कठिनाई संग
    हमको यह रीत अधिक भायी है
    रण में आज डटे हैं केशव
    धर्मयुद्ध में जग की भलाई है
    ©niharikanilamsingh