• moonish_girl_tiwari 10w

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    वो दिन

    मैं धूल में सना,,,,,
    मैं भूल में चला,,,,,
    और गांव पहुंच गया।

    जब खोली मैंने आंखे,,,,
    वह एक खोली थी किसान की,,,
    बस वही पला बढ़ा।

    खूब था मक्खन,,,,
    चुपड़ी घी की बाटी,,,,
    दही की रंगत में बहुत भाती थी।

    पर कलम पकड़ी,,,,,
    तो छूट गया गांव,,,,
    छूट गई मां के आंचल की छांव,,,,
    अलमस्त उद्दंडता बीत गई,,,,

    गम्भीरता से भर गया,,,,
    और चित्त का ठिकाना ठग गया,,,,
    मक्खन बाटी,,,, गायब थे
    ब्रेड नमकीन आसरा बना,,,

    बनाया तो खाया,,,,
    नही तो भूखा सो गया,,,,
    किसान का पुत्र मैं,,,,
    अन्न में खेला कूदा,,,,

    पर आज तो वक्त बदलसा गया ,,
    परवरिश अपनी से इतर,,,
    सन्तति की विमुख,,,,
    चॉकलेट पर आ टिकी,,,,

    मेरा किसान पुत्र होना,,,,
    शहर में कलम के अक्षर,,,,
    चार पैसे कमाने लायक ,,,
    बना कर रख दिया,,,,,

    चार नही चार सौ दाने तो,,,
    गांव आंगन में,,,,
    कबूतरों को,,,,
    नन्ही मुट्ठी से फेक कर,,,,
    कबूतर बन उड़ता था।

    कलम के पांच अक्षरों ने,,,,
    चार पैसों में बांध दिया,,,
    पिंजरे का कबूतर बन,,,,
    सुबह से शाम,,,
    पिंजरे की गुरगूं,,,
    और एक दायरा,,,

    दाना, पानी,,नहाना सोना,,
    सब एक ही पिंजरे में,,,,
    कलम का सिपाही,,,,
    शहर का गुलाम,,,,
    जिसका गांव था मुकाम,,,,

    स्कूल बंद,कॉलेज बन्द,,,,
    गांव आज भी खुला है,,,,
    कोरोना से उजड़ा,,,
    गांव बचा है,,,,

    रेत में खेला बचपन,,,,
    बेर,सांगरी,गाजर मूली,,,
    ग्वाल पान से लाल ओंठ,,,
    सितोलिया,दड़ी,,,,
    छुपम छुपाई,,,
    मां हो या ताई,,,

    पर कलम ने दे दी,,,,
    शहर की तन्हाई,,,,
    एक कमरे में समाही,,,
    मासिक कमाई,,,,
    हर रोज की गंवाई,,,

    उफ ये शहर की सगाई,,,
    दिल मे क्यो उग आई,,,,

    आ लौट चले,,,
    अल्हड़ बचपन मे,,,,
    गांव के मधुवन में,,,,
    जो जहां से आया है,,,
    वही वो जाता है,,,

    बीच राह में,,,,
    छद्म जीवन मे,,,
    कुछ पल बहक जाता है।

    चलो सम्भल लेते है
    गांव को लौट लेते है,,,,

    ~~~~βÿ β®oťhéř