• samaksh10 23w

    हक़

    हक़ तो न तेरा था न मेरा है
    बस कुछ छंद मोह्हबत का फेरा है
    हो तेरे दरमियां या मेरे पास मे
    बस ख़ुशी रहे उसकी हर एक सांस मे

    ना लाना आरज़ू-ऐ-दगा-ओ-हमदम
    देखना न हो कभी उसकी आँखे नम
    जो लफ्ज़ो ने तेरे, कभी दर्द दिया उसको
    तो साम-दाम-दंड का, एक खेल दिखेगा सबको

    नही डर है मुझको कोई तुम्हारी दोस्ती से
    बस दूर रखना उसको 'कल' की गैरियत से
    अब समझदार तो तुम हो, समझो अनकही बाते
    जो अब भी न तुम समझे, तो काटना मातम-तलब राते
    ©samaksh10