• urvashi_s 16w

    वर्षा

    चहचहा उठीं सारी पक्षियाँ,
    सुन,
    बादलों के गरजने की शोर।
    उड़ चलीं नीले गगन में,
    अपने पंखों को खोल।
    नाच उठे मोर सारे;
    कोयल भी लगी,
    सुनाने अपनी मिठी बोल।
    जब सुनी,
    बादलों की शोर।

    मच गया कोलाहल।
    जैसे खुशी का छाया मंजर;
    धरती भी महक उठी,
    खिलखिला उठे बेजान सरोवर।
    पेड़ पौधे भी सब मुस्कुरा उठे;
    स्वागत के लिए हुए सब तैयार,
    जैसे ही आई वर्षा की बाहार।

    वर्षा आई, या आया कोई रिश्तेदार!
    सभी कर रहे थे उत्साह से इंतजार।
    खिड़कियां खुली,
    खुले घर के सारे द्वार।
    बच्चे-बूढ़े सब नाच उठे,
    जैसे ही आई वर्षा की बाहार।

    वर्षा का,
    न कोई रूप न कोई रंग।
    फिर भी कर जाती है मन को पावन।
    अपने साथ,
    लेकर है आती जैसे कोई त्योहार;
    मोहित हो उठता है पूरा संसार।
    कण-कण को है प्रफुल्लित कर जाती,
    जब आती है इसकी बाहार।
    ©urvashi_s