• asmita_shukla 30w

    Neither the language nor the couplet does represent any particular community or section of society. It reflects only the scenario of the country and lack of the sense of patriotism.
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    तावीज़

    ये जो पहने हैं सभी ने मज़हबी तावीज़,
    कभी लेकर चलते थे तिरंगा शान से।
    वतन-परस्ती पर शक मेरे करते हैं लोग,
    सिनेमाघर में जो मैं बैठी थी आराम से।

    अस्मिता
    ©asmita_shukla