• smriti_mukht_iiha 23w

    शिव_स्तुति����
    "शिव" मात्र एक शब्द नहीं समूची सृष्टि को स्वयं में समाहित किये एक दैदीप्तयमान प्रकाश है ।।

    शिव मौन आस्था हैं, अटूट विश्वास हैं।
    शिव में ही समाहित पाताल और आकाश हैं।
    शिव मन के भोले भंडारी हैं और क्रुद्ध हो जाएं तो संहार हैं।
    शिव साधक हैं, बैरागी भी और उन्हीं के अधीन है माया सारी ही।
    देव भी उनके आगे नतमस्तक हैं और दानव भी उनके भक्त हैं।
    शिव ध्यान में ही लीन रहें, तांडव हो जब त्रिनेत्र खुलें।जटा में गंगा धार और गले में वासुकी हार।
    हलाहल ग्रहण कर सृष्टि पर की कृपा अपार।

    शिव की ही शक्ति है, शिव से ही भक्ति है।
    ओंकार की टंकार है,त्रिशूल का प्रहार है।
    जिनसे ही बृह्माण्ड है,जो नंदी पर सवार हैं।
    हैं जन्म स्वयं महाकाल हैं , शिव शंभू निराकार हैं ।।

    शिव आप सभी का दिन शुभ करें।
    ॐ तत्सत!!!
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