• oracular_ 11w

    जो लफ्ज़ उलझे हैं सीने में
    बर्फ़ के कतरों जैसे
    चले आते हैं कभी-कभी सांस बनकर

    उड़ कर बैठ जाते हैं रंगीन पतंगो से
    काग़ज़ के तिनको पर
    सहम कर बावरी बौछारों से

    कच्ची कश्तियाँ बनाकर
    छोड़ देती हूँ इन्हें वापस
    मैं उन्हीं बारिशों में

    मुकम्मल ना हो पाए
    अब जो ये तैर कर
    तो एक आखिरी तदबीर
    डूब कर ही सही

    ©oracular_