• pragatisheel_sadhak_bihari 31w

    बालाएं

    जरा सा किसी ने अदब क्या दिखाया,तुमने तो अपना ईमान तक को बेच खायी है
    रौंदकर उसके जज्बातों को............तुमने महज हैवानियत का ही सेज सजायी है

    बालाएं जो दिखती हैं राह चलते बाज़ार में...............वो सारे होते तेरे मंगेतर नहीं
    फिर क्यों तुम अपनी निगाहों को..............उनकी हुस्न रूपी तस्वीर ही थमायी है

    लटक झटक देखने और दिखलाने के लिये......पूरी उम्र है बाकी रे नादां ए बालक
    अभी से क्यों तन तेरा,पलंग तोड़ गर्मी को...कूड़ेदान में डालने की कसम खायी है

    करवटें बदलने की है नारी कोई उपक्रम नहीं.............के जब पाओ पास बुला लो
    मरघट पे जलोगे तब नेक नज़र तकेंगे तक नहीं...पूरी उम्र पाप संग जो बितायी है

    हया गर नारीत्व का मूल है तो संयम है होता................पुरुषार्थ से निकला मूल्य
    तभी कुछ नेक पुरुष जलील होकर भी...............नारियों पे उँगली नहीं उठायी है

    कुछ नारियां कवच बनाकर जीने लगती हैं..................अपने हुस्न रूपी ढाल को,
    नित्यदिन नई तस्वीर बदलती...............क्योंकी वो हुस्न रूपी ढाल जो कमायी है

    'साधक' इतनी भी फिक्र मत किया कर जमाने का....तब भी ना होगी कद्र तुम्हारी
    'खुदा' बोल तो उद्दंड है ही, अब चित गंदा कर.....क्यों करना मुझे काली कमाई है



    ©gatisheel_sadhak_bihari