• nehulatagarg 23w

    ही विश्राम कर रहें थे और तभी वही नवयुवक हमारे पास आयें और उन्होंने हमें रूग्ण अवस्था में देखा तो हमारी सेवा करने लगे और हमने उन्हें बहुत मना किया परन्तु वो नहीं मानें और हमारे लिये काढा बना लायें और जब काढा हमें पिलाने लगे तो हमारे मुंह तक लाते - लाते उन्होंने थोडा सा उस पात्र को छलका दिया जो हमारे सीने पर गिरा और वो हमसे क्षमा मांगने लगे तो हमने उनसे कहा की , कोई बात नहीं हो जाता है कभी - कभी और उसके पश्चात वो वस्त्र के टुकड़े से हमारे मना करने के पश्चात उसे पौंछने लगे परन्तु इस तरह से सामने बैठे हम पर झुके हुए से की , तभी हमारे घर का द्वार खुलता है और हमारे सहकर्मी वहाँ आ पहुंचते है और उन्हें सामने देखकर कुछ और ही कहानी गढता हुआ इस भांति अभिनय करता है मानों हम उन्हें विवश कर रहें हो और उनके साथ जबरदस्ती कर रहें हो और एकदम से उठकर गिडगिडातें हुए रोत हुए हमसे और सभी से कहने लगता है - क्षमा कीजिए हमें परन्तु हम और अधिक समय तक आपकी कामनाओं को पूर्ण नहीं कर सकते । आपका उपकार है हम पर की , आपने हमारी सहायता की और हमें कार्य दिलवाया परन्तु उसके बदले में यह सब नहीं कर सकता अब और यह कहकर फूट - फूटकर रोने लगता है तो सभी हमें ही धिक्कारने लगते है और वो कहता चला जाता है और फिर इस तरह से वहाँ से भागने लगता है मानों वो इस अपराधबोध से त्रस्त होकर व्यथित आत्महत्या के लिये जा रहा हो और सब लोग उसे पकडकर रोकते है और उसके पश्चात हम राजसभा में अपराधी के रूप में खडे रहते है । जिस सभासद ने हमें समाज में सम्मिलित होने के विरोध किया था वह युवराज औऱ महाराजाधिराज से कहने लगते है - हमने कहा था ना की , व्यक्ति अपना गुणधर्म कभी भी नहीं त्यागता फिर चाहें उसे उसके उस गुणधर्म से विलग ही क्यों ना कर दिया जायें परन्तु वो अपनी प्रवृति कभी नहीं छोडेगा और यही प्रमाणित किया है इस स्त्री ने और इसने सिद्ध कर दिया की , चोर को साहूकारी कभी भी नहीं

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    चित्रांगना

    भाती और जिसका चरित्र मलिनता को प्राप्त कर लें वो फिर कभी भी पवित्रता को प्राप्त नहीं हो सकता फिर चाहें कितने ही प्रयास क्यों ? ना कर लिये जायें । यह सामने खडा नवयुवक मलय है जिसके साथ यह दुराचार करती रही और इस सीमा तक गिरती चली गयी की , इस बेचारे को आत्महत्या के लिये विवश होना पडा तो महाराजाधिराज मलय से पूछने लगते है - तुम्हें भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है स्पष्ट रूप से अपनी बात तुम रख सकते हो इस सभा में और आश्वस्त रहो की , तुम्हें न्याय अवश्य मिलेगा यहाँ । मलय हाथ जोडकर दुखी भाव से बताने लगते है - हमें आपके न्याय पर पूर्ण विश्वास है महाराजाधिराज । हम विस्तारित रूप से आज आपको सबकुछ बतायेंगे और हुआ यूँ की , हमारे स्वामी के निकाल दिये जाने के बाद हम भटकते हुए यहाँ आ पहुंचे और हम इन्हें मूर्छित घायल अवस्था में मिलें और इन्होंने हमारा उपचार करवाया हमारी सेवा की जिसके कारण ही हम स्वस्थ हुए और जब हम पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गये तो हमने इनसे विदा लेनी चाही तब इन्होंने हमसे पूछा की , हम अब कहाँ जायेंगे ? क्या करेंगे ? तो हमने इनसे कहा की , हमें ज्ञात नहीं की , हम अब आगे क्या करेंगे ? तो इन्होंने हमसे कहा की , यदि हमें आपत्ति ना हो इनकी सहायता लेने में तो यह हमें कार्य दिलवा सकती है और हम यह सुनकर मान गये और इन्होंने हमें सराय में कार्य दिलवा भी दिया और एक दिन अचानक इन्होंने हमें अपने घर बुलवाया और जब हम इनके घर पहुंचे तो यह बैठी हुयी थी अपने शयनकक्ष में फिर उसके पश्चात यह अपने बिस्तर से इस प्रकार उठी की , यह गिर गयीं और इन्होंने इस तरह से अभिनय किया मानों यह उठ ही नहीं पा रहीं हो तो हमने इनकी उठने में सहायता की और जब इन्हें इनके बिस्तर पर लेटाने लगे तो इन्होंने हमें खींचकर चित्त दूसरी तरफ लेटा दिया और उसके पश्चात हम बता नहीं सकते की , क्या हुआ ? और यह उस घटना के पश्चात हमें जब - तब बुलाती रही और यह घृणित कार्य करती रही और यह कहकर रो पडता है बालकों की भांति । उसके पश्चात जब न्याय