• ak__07 24w

    आ ज़िन्दगी तू फिर एक बार मुझसे टकरा लेे....
    लड़ मुझसे आ फिर एक बार और दम तू अपना आजमा लेे...
    ऐ ज़िन्दगी तू गिरा मुझे जितना तू गिरा सके....
    दे दर्द मुझे ज़ख्म मुझे जितना तू दे सके...
    आज गिरूंगा भी ज़ख्मों के दर्द से रोऊंगा भी....
    कहा मैंने हर दफा आज फिर तू ज़िन्दगी ये मान ले... 
    दम नहीं तुझमें इतना के मुझको तू हरा सके...
    ये दुनिया मेरी...मैं ही इसका बस एक बादशाह हूं...
    बस एक मैं ही जिससे कभी मैं जो हारा हूं....
    ऐ ज़िन्दगी तू क्या इन लोगों से मुझको डराएगी...
    मेरी हार पर हसी इनकी...उठ ती ये उंगलियां मूझपे कुछ असर ना कर पाएंगी...
    याद रख लेे मेरे हर सपने मेरे ये इरादे और मेरी ये उम्मीदें...
    जीत पर मेरी कल को ये उंगलियां ही तालियां मेरे लिए बजाएंगी...
    तूने कोशिश की हज़ार ज़ख्म दिए मुझे हर बार...
    ये ज़ख्म ये आंसू ही बने आज मेरी तलवार....
    ऐ ज़िन्दगी आज फिर तू बस एक बात ठीक से समझ ले...
    कोशिशें जितनी दफा कर ले...दम नहीं तुझमें इतना के मुझको तू हरा सके.....
    ©ak__07