• deepak_khati 35w

    Change for the better
    Bt don't expect anything from others

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    वो जो मुझे पत्थर दिल कहा करते थे
    आज खुद पत्थर हुए बैठे हैं
    मैंने तो पिघल कर भी देखा है।
    शायद दुनिया के लिए मेरा गुरूर ही अच्छा है
    मैंने तो बदल कर भी देखा है।
    टुटे हुए टुकड़ों पे भी लोग पत्थर मारते हैं
    किसी से उम्मीद ना रखना समेटने की
    मैंने तो बिखर कर भी देखा है।
    इश्क का पानी खारा है बहुत
    मैंने इस दरिया में उतर कर भी देखा है।
    शाम होते ही सब अपने घर लौट जाते हैं
    मैंने अंधेरों में ठहर कर भी देखा है।
    जो एक बार आगे बड़ गया
    फिर वो मुड़कर नहीं देखता
    मैंने तो उन्हें बुला कर भी देखा है।
    रोशनी हो जाए तो फिर "दीपक" की कदर नहीं होती
    मैंने तो इसे जला कर भी देखा है।

    ©deepak_khati