• manmauzi 49w

    छोटा बालक

    एक बालक था छोटा सा, उसका बस इतना दोष था
    नहीं मिला था प्यार उसे(इस दुनियां से)
    उसको बस इसका अफ़सोस था।
    देख दूसरों को रोता, उसका भाग्य तो सोया था,
    क्योंकि छोटी सी उमर में ही उसने एक अनमोल हीरा खोया था, जिसका कि ना उसको होष था।
    एक बालक था छोटा सा, उसका बस इतना सा दोष था......
    बचपन में ही उसने अपनों को पराया होते देखा था,
    बचपन में ही उसने अपने ख्वाबों को,सपनों में खोते देखा था।
    जोर-जोर से चीखता था वो, पर उसको कोई न दिखता अपना था।
    ये सारा जहां मानो उसके लिए खौफ़ भरा एक सपना था ।
    इसीलिए सारी दुनियां के लिए उसकी आँखों में आक्रोश था।
    एक बालक था छोटा सा उसका बस इतना सा दोष था........
    वो जहाँ कहीं भी जाता था ,
    हर जगह ठुकराया जाता था।
    उस बेचारे बालक को ,हर जगह सताया जाता था।
    उस स्वतन्त्र बालक का नहीं किसी को होश था।
    एक बालक था छोटा सा , उसका बस इतना सा दोष था.......
    उसके भी थे कुछ छोटे सपने,
    पर वो नादान क्या जाने कि,
    सपनों पर ना था उसका अधिकार।
    क्योंकि बचपन ही छिन गया था उससे उसकी माँ का दुलार।
    इसीलिए एक माली के उजड़े हुए बाग की तरह लगता था उसको सारा संसार।
    एक बालक था छोटा सा,
    आखिर उसका ऐसा क्या दोष था,
    जो नहीं मिला था प्यार उसे (इस दुनियां से)
    जिसका उसको अफ़सोस था।।

    ©manmauzi