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    पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास जी की यह रचना सोहर छ्न्दों में है और भगवान श्रीराम के विवाह के अवसर के नहछू का वर्णन करती है। नहछू मुख्य रूप से नाखून काटने एक रीति है, जो पूर्वी भारत में विवाह और यज्ञोपवीत के पूर्व की जाती है। यह विशेष रूप से नाई या नाइन व अन्य सम्बन्धित स्त्रियों के नेगचार से सम्बन्धित होती है। तुलसीदास की 'रामलला नहछू' रचना अवधी भाषा में है और सरल स्त्री लोकगीतोपयोगी शैली में प्रस्तुत की गयी है।

    'श्रीरामलला नहछू
    कटि कै छीन बरिनिआँ छाता पानिहि हो।
    चंद्रबदनि मृगलोचनि सब रसखानिहि हो।।
    नैन विसाल नउनियाँ भौं चमकावइ हो।
    देइ गारी रनिवासहि प्रमुदित गावइ हो ।।८।।
    (अत्यंत पतली कमर वाली बारी पत्नी छाता हाथ में लिए है, जो चन्द्रमुखी-मृगनयनी और सर्व रसों की खान है। विशाल नेत्रों वाली नाई पत्नी (नाइन) अपनी भौहों से संकेत करती हुई प्रसन्न मन से महारानियों का नाम लेकर विशेष लोकगीत (गाली) गा रही है।)

    कौसल्या की जेठि दीन्ह अनुसासन हो।
    ``नहछू जाइ करावहु बैठि सिंहासन हो।।
    गोद लिहे कौसल्या बैठी रामहि बर हो।
    सोभित दूलह राम सीस पर आँचर हो ।।९।।
    ( महारानी कौशल्या की कुलश्रेष्ठ स्त्रियों ने उन्हें सिंहासन पर प्रभु के साथ विराजमान होकर नहछू (नखछौर*) की विधि संपन्न करने की आज्ञा प्रदान की। तद्नुसार महारानी प्रभु के शीश को अपने आँचल से ढककर उन्हें अपनी गोद में लेकर सिंहासन पर विराजित हुईं।)

    नखछौर* : मूलतः विवाह और यज्ञोपवीत के अवसर पर नाखूनों को विशेष छूरे (नहन्नी) से काटने की प्रथा है। किन्तु इस अवसर पर प्रयुक्त सभी वस्तुओं का मंगल कलशादि से स्पर्श कराकर, उनके वास्तविक मूल्य से कई गुना मूल्य उनके निर्माता/विक्रेता को प्रदान करके कृतज्ञता प्रकट करते हुए ग्रहण किया जाता है। जिसमें हिन्दू समाज के प्रत्येक व्यावसायिक वर्ग का यथोचित सम्मान होता है। अतः ये सामाजिक उत्सव हिन्दू वर्ण व्यवस्था का अभिनन्दन पर्व बन जाते हैं। यह परम्परा आज भी अपनी मूल संस्कृति को समझने वाले परिवारों/क्षेत्रों में यथावत बनी हुई है।

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    सरलार्थ
    ८,९


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