• pragatisheel_sadhak_bihari 34w

    संकीर्ण रास्ते

    संकीर्ण जब रास्ते...............................विदीर्ण होते हौसले,
    विकीर्ण तम तब.................................थमाते गम घोंसले!

    कर सिंचित उत्थान-पतन............................सदृश्य ज़हन,
    कुंठित तब गम...............................बोले तू है तप महल!

    चित व्याकुल.........जब पग भयभीत,
    परे नज़र प्रवासित.......तब सारे मीत,
    कभी देख खुशियाँ...थे उल्लासित जो,
    अब उपहास उड़ाते...........मान मेरी हार और अपनी जीत!

    लिप्त करुण चीखें चित उद्गार करे......राहों में मन प्रहार सहे
    जो मान लिया गम को ही मंजिल......वही बस प्रतिकार धरे

    आफतें हजार तब मन लाचार.......अपरिहार्य आस बस एक
    आहत मन जो दौड़ लगाए...बिन सपने भी पाते मंजिल पास

    मग्न बदन हैवान है,तंग बदन तूफान है, रंज बदन शमशान है
    गम संग चले जो हँसी खुशी......उन्हें ही मिलता जीत जवां है

    समग्र जहां कौतूहल करे,पर भीड़ भँवर भी जो मन एकाग्रचित
    ध्यान बहुल मूल शोध लिये........वही जीवन का हर पहर जिये


    ©gatisheel_sadhak_bihari