• pragatisheel_sadhak_bihari 31w

    हैवान

    इतना ही समझ में आया था कि....................हर ओर खामोशी है,
    क्या पता था...कि यह आने वाले तूफ़ान के स्वागत की गर्मजोशी है!

    सन्नाटा पसरा था मेरे महफ़िल में..............जैसे कुछ लूट सा गया है,
    दबी जुबां मैंने शोर किया.....लोगों को लगा यह अहं की मदहोशी है!

    सुना तो था बदनाम गलियों में..................भड़ुए नंगा नाच करते हैं,
    पर देखा न था ऐसी फ़ितरत जिसमें निवासित नियत होती हवशी है!

    कयास लगा रखा था कि दानव,दबे पांव आकर ही चलेंगे कोई दांव,
    तभी दांव में पाकर एक मोहरा को,,दे दी अपनी ओर से शाबाशी है!

    शतरंज के चाल पे ही तय होती है किसी को जीवन, किसी को मौत,
    भत्ता मैंने खूब दी....क्योंकि शतरंज पहले से ही ठहरी मेरी दासी है!

    रहते हैं हम अनजान शहर........माँ बाप के सपने को साकार करने,
    राहों में खाते ट्रेन और मेट्रो के धक्के,बातों में कहते संघर्ष सन्यासी है!

    "साधक" यह अजीब दास्तां है..... कि हर किसी के पास बड़ा मुंह,
    नियत में नेक विचार पलते नहीं,मुख से बस भीड़ को दिखाते मृदुभाषी है!


    ©gatisheel_sadhak_bihari