• sukritisingh 9w

    रूहानी

    खिड़की के पास बैठी मैं कहीं खोई ही थी कि,
    ठंडी हवा मेरे गालों को छू के मुझे आज में ले कर आ गई।
    तुझे याद कर दोबारा मन लगाया ही था कि,
    कमबख्त बारिश तेरे साथ होने का एहसास ले कर आ गई।
    जैसे - जैसे वो ज़मीं को गीला करती गई,
    मैं तेरे खयाल में भीगती गई।
    जितनी वो तेज़ होती गई,
    उतनी मोहब्बत मुझे तुझसे रंगरेज होती गई।
    खुद को दरिया में मयस्सर करती
    वो जाते जाते ज़रा मेरे होठों पर भी छींट गई,
    और तेरे - मेरे रिश्ते को जिस्म से कहीं ऊपर, रूहानी बता गई।
    ©sukritisingh