• msr_prose 14w

    अफ़लातून

    एक जमाने में मैं सिर्फ उसे उसके नाम से जानता था,,
    मगर कुछ वक़्त पलटने के बाद, अब मैं उसे उसकी रूह से पहचानता था।।
    बस बात इतनी सी थी कि अब बयां नहीं की जा सकती,,
    वो ज़ईफ़ यादें अब जवां नहीं की जा सकती।।
    हां... थोड़ा सब्र करो तो बता सकता हूं,,
    क्या मैं तुम्हारा थोड़ा वक़्त लेके तुम्हें भी उसकी यादों से सता सकता हूं।।
    उसके साथ मुझे खुशनुमा सा प्रतीत हो रहा था,,
    मैं बेखबर था इस बात से कि वहां से मेरा सोने जैसा अतीत शुरू हो रहा था।।
    उसकी कुछ यादें अभी भी तितली बनकर मेरे दिल के गुलसितां में घूमती हैं,,
    अहसास करता हूं जब-जब उसका मेरी पलकें उन अश्कों को चूमती हैं।।
    धीरे-धीरे मैं भी उसको जान रहा था,,
    मेरा दिल उसे मुझसे भी ज़्यादा अपना एक अहम हिस्सा मान रहा था।।
    अब ये दौर उस उरूज़ पर पहुंच गया था ,,
    जिस मंजिल को पाने निकला था अब वो रास्ता वहां नहीं था।।
    पता नहीं कि ये गीत था कि ख्वाब वो तराना हो रहा था,,
    मेरा नसीब तो हैरतअंगेज था ही , और मैं महाराणा हो रहा था।।
    अब तो मैं उसके सामने पूरा बेपर्दा बन गया था,,
    पता नहीं चला कि कब वो मेरा ख़ुदा बन गया था।।


    और आज तो देखो....
    कुदरत ने कैसा खेल रचा दिया,,
    मेरे महबूब को ही मेरा मुखालिफ बना दिया।।
    एक ख्याल आता है मन में कि---
    तूं इन हसीं ख़्वाबों नींद कैसे सो सकता है,,
    तूं अपने ख़ुदा के खिलाफ कैसे हो सकता है।।
    थोड़ा तो गुरूर मुझे भी हो रहा था,,
    मैं अपने ख़ुदा के सामने हारने को मजबूर हो रहा था।।
    पता नहीं उसे आईं या नहीं मगर मुझे तो बेवजह आ रही थी,,
    उससे हारने में तो मुझे बेशुमार वफ़ा आ रही थी।।

    अब तो उसे भी महसूस हो गया होगा कि उसका मेरे बिना गुज़ारा न होगा,,
    उसने हराया होगा बहुतों को मगर, हम जैसा कोई हारा न होगा।।
    बस अब यहीं एक अदब सा किस्सा था,,
    अटूट , अजर और संवरती जिंदगी का एक अहम हिस्सा था।।
    बस अब यहां से तो एक ऐसा राग प्रकट हुआ कि वो मेरे कानों की धून बन गया,,
    अब वो मेरे लिए केवल हमसफ़र ही नहीं था,
    '" अफ़लातून '" बन गया।।
    ©msr_prose