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    माँ

    मेरे घर पर एक औरत थी, दीदी भैया उसे माँ बुलाते थे,
    जब कभी वो घर पर ना होती थी, सब उसी को याद कर चिल्लाते थे।

    न जाने कब सुबह उठ के खाना बनाकर, काम पर चली जाती थी,
    थकी हुई शाम को आकर, फिर चुल्हे चौके में लग जाती थी।

    ना जाने कैसे वह इतना सारा काम कर पाती थी,
    मुझ मासूम की तो चार कदम चलने में जान निकल जाती थी।

    इतना सब करने के बाद उसे मिलता कुछ ना था,
    क्यों करती हो बेमतलब इतना, मुझे उससे पूछना था।

    इन सबके बावजूद वो अकेली घर को संभाल लेती थी,
    खुद के लिए भले वक्त मिले ना मिले, पर हम सब के लिए वक्त निकाल लेती थी।

    उम्र हो गयी है उसकी, पर आज भी हम सबके लिए दुआ करती है,
    ना पता था माँ इतनी अच्छी हुआ करती है।

    कितना प्यार करता हूं माँ से, ये ना बता पाता हूं,
    घर जाते ही बस माँ के गले लग जाता हूं।

    Rahul Khatri| The Unheard Tales