• singh_harshwardhan 31w

    आसमां के तारे

    नही गिनता हूँ आसमां में तारे अब मैं,
    खुली आँखों से बचपन में जब वो छत्त पे सोते हुए तारे गिना करता था, तो लगता था सारा आसमान मेरी मुट्ठी में है।
    पर उम्र के साथ सब फिसलता रहा, मेरा सपना छूटता रहा, अकेला मैं दौड़ता रहा भागता रहा।
    नही गिनता हूँ आसमां में तारे अब मैं, क्योंकि धीरे धीरे मैं बड़ा होता रहा।
    कभी इस समाज ने मुझे चलाया और कभी मैं इसके हिसाब से चला, सोचा यही सही है, दुनिया की यही रीत रही है।
    पर मैं गिरा, दिल दुखा और चोट लगी, बिस्तर पे लेटे लेटे खुद से खूब सवाल जवाब किये और उन्ही सवालों को ओढ़ के मैं सोया भी हूँ।
    नही गिनता हूँ आसमाँ में तारे अब मैं, क्योंकि अक्सर उन चार दीवारों के बीच, मैं रोया भी हूँ।
    डूबते को जैसे तिनके का सहारा मिलता है, वैसे ही सहारे मैंने भी ढूंढे, लगा अब तो पार लग ही जाऊंगा, अब तो किनारे पहुंच ही जाऊंगा, पर कम्भख्त पानी और भी गहरा निकला और वो तिनका भी डूब गया।
    सन्नाटे में जिस तरह शोर की एहमियत होती है, उन तारों की एहमियत भी कुछ ऐसे ही थी मेरे लिए, पर अब ना तो वो बचपन वाला आसमाँ है ना वो तारे और ना ही वो गिन ने वाला मैं, बस है तो कुछ सांस लेते ख्वाब जिन्होंने सहारा दे रखा है, रात को घर से दूर जब सोता हूँ तो प्यार से लिपटके मेरे साथ सो जाते हैं।
    इसीलिए नही गिनता हूँ तारों को अब मैं, क्योंकि सिर्फ टूटते हुए देखा है इन्हें, हज़ारों ज़ुबानों को दुआ मांगते देखा है और उन दुआओं को बिखरते हुए देखा है।

    ©singh_harshwardhan