• nehulatagarg 34w

    यह बुद्धिमता नहीं चलेगी अंगना । आप यदि बुद्धिमति है तो हम भी बुद्धिहीन नहीं है और आपको तो प्रसन्न होना चाहिए की , आपके भांजे का पालन - पोषण आप स्वयं ही करेंगी और स्मरण रखिएगा स्वयं भी और सब भी यदि किसी ने भी कोई भी चालाकी करने का प्रयास किया या इन लोगों में से कोई भी लौटकर यहाँ वापिस आया तो आपके साथ तो हम कुछ करेंगे या नहीं परन्तु उन अबोध बालक - बालिकाओं और आपके भांजे अगस्तय के साथ हम क्या करेंगे ? यह हमें बताने की आवश्यकता नहीं है तो सीधे तरह से यह लोग यहाँ से चलें जायें और हमारे सैनिक इन्हें भारतवर्ष की सीमा से बाहर पहुंचा देंगे सुरक्षित लेकिन बीच में रास्ते में भी कोई भी छल करने का प्रयास सबको कौनसी हानि पहुंचायेगा यह हमें बताने की आवश्यकता नहीं । अंगना को कठिका और कुछ श्रेणीकाऐं साथ लिये ला रही होती है महल के मुख्य द्वार से और अंगना तो जडवत सी जबरदस्ती सहारा देकर लायें जा रही थी और उसकी आँखों के सामने वही दृश्य चल रहें थे जब सब घरवालों को ले जाया जा रहा था रथों में बन्धी बनाकर और अंगना दौडने के लिये कदम आगे बढाती है उन्हें रोकने के लिये लेकिन सौम्यदीप सामने आकर उन्हें पकड लेते है और वो बस छटपटाकर तडपती सी आँखों में आँसूओं के समंदर को लिये रह जाते है और मन बहुत करता है की , , सारे बन्धनों को तोड़कर वो चित्रांगद के पास पहुंच जायें लेकिन वो कर नहीं पाती बस मन मसोसकर रह जाती है । शरीर में ना जान बची थी और ना ही रूह क्योंकि वो तो चित्रांगद के पास चित्रांगद में ही बसी थी और था ही क्या अब अंगना में बचा हुआ । अंगना तो एक जिंदा लाश सी बनी हुयी बस सहारा दिये चलायें जा रही थी । सदमा इतना गहरा था अंगना के अन्दर की वो तो सबसे बेखबर हो चली थी और उन्हें देखकर उनकी प्रजा की आँखे नम थी तो ह्रदय में एक पुकार ईश्वर से की , वो कैसे भी करके इस अनर्थ को रोक दें लेकिन ईश्वर ने भी जैसे मुंह मोड लिया था सबसे और आज सब बेबस और लाचार थे और परेशानी के साथ

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    चित्रांगना

    - साथ तकलीफ में भी थे लेकिन सिवाय खुद से नाराज होने से ज्यादा वो कुछ कर नहीं सकते थे । अंगना को जबरदस्ती मंडप में बैठा दिया जाता है और वो सदमें में महल के बाहरी द्वार पर टकटकी लगाये देखें जा रही थी मानों अभी चित्रांगद झट से अन्दर आ जायेंगे और उनकी चुलबूली मुस्कुराहट से जैसे वो हमेशा घायल करते आयें है अंगना को ठीक वैसे ही आज भी उनकी वो शरारत भरी दिल को छू जाने वाली मुस्कान उनके दिल से उनकी रूह में उतरकर उन्हें फिर से तरोताजा कर देगी और हमेशा की तरह वो बस उसी हँसी में खोकर रह जायेगी । चित्रांगद के चेहरे की वो मासूमियत वो चुलबुलाहट और शरारती अंदाज जिसकी बहुत बडी दीवानी और कायल रही है वो हमेशा और इसीलिये तो उसे उनसे मोहब्बत इतनी है । नजरों को उनके दीदार की कसक थी और दिल को उनके प्यार के जज्बातो़ ने बेकस किया हुआ था और पल - पल बेदम होती है सांसों की जिंदगी सिर्फ़ चित्रांगद की बाहों का सहारा चाहती थी और उठती हर एक आह सिर्फ़ चित्रांगद का नाम ही पुकारती थी और तडप थी इतनी की , बस भागकर चित्रांगद के आगोश में अपने बिखरे हुए वजूद को समेट लें वो लेकिन दूर - दूर तक कोई नामों - निशान नहीं था चित्रांगद । जब बनें ही एक - दूसरे के लिये थे तो फिर किसी और का यूँ आना क्यों हुआ उनकी जिंदगी में । मोहताजी थी इतनी जितनी कभी नहीं थी और बेबसी का आलम इतना खौफनाक और डरावना तो कभी भी नहीं था । क्या हो रहा था ? क्या नहीं ? कोई भी खबर थी ही नहीं बस होता जा रहा था । अंगना से जबरदस्ती जैसे एक बेजान मुर्दें के शरीर को पकड - पकडकर चलाया जाता है वैसा ही कुछ अंगना के साथ हो रहा था होम करने की रस्म हो या पाणीग्रहण की या गठबंधन और फेरों की रस्म हो सबमें जबरदस्ती सहारे से पकड - पकडकर जबरदस्ती पकड़े हुए चलाया गया और इसी तरह बडी ही मुश्किल से यह शादी हुयी । अंगना को ले आया गया था पहले चित्रांगद के कक्ष में जिसे सजवाया भी चित्रांगद द्वारा गया था सौम्यदीप की इच्छा पर और वो वहाँ से फिर दूसरे नये कक्ष में ले आया जाता है अंगना को और वो बेचारी बदहवास सी बेजान बस चलें