• ubhayhastkushal 5w

    मुझे कुछ नहीं आता

    -Shubham Joshi
    ©ubhayhastkushal

    यूँ तो मुझे बहुत कुछ आता है
    फिर भी मुझे कुछ नहीं आता

    अकेले में बैठ लिखता हूँ कविताएँ
    पर किसी की फरमाइश पर, कुछ पेश नहीं कर पाता

    बचपन में ही लिख दिया था उपन्यास
    पर उसे छपवा न पाने का दुःख आज भी है सताता

    संस्कृत भाषा का ज्ञान रखता हूँ
    पर वेद पुराण गीता का अनुवाद नहीं कर पाता

    उभयहस्तकुशल हूँ, लिख सकता हूँ दोनों हाथों से
    पर दोनों हाथों से एक जैसा नहीं लिख पाता

    गायन भी किया है संस्कृत और हिंदी में
    पर धन्यवाद, बेसुरी आवाज का, ठीक से गा भी नहीं पाता

    विभिन्न प्रकार के व्यायाम कर लेता हूँ
    पर दुबला ही हूँ, वज़न बढ़ नहीं पाता, शरीर बन नहीं पाता

    बाँसुरी और पियानो जैसे वाद्य हूँ मैं बजाता
    पर नहीं पता कैसे, क्योंकि मुझे संगीत का स भी नहीं आता

    दोनों हाथों की उँगलियों पर एक साथ दो किताबें हूँ घुमाता
    पर क्या फ़ायदा है ऐसा करने का, ये समझ नहीं आता

    डंडे भाले तलवार घुमा कर खुद को योद्धा समझता हूँ
    पर आलस इतना, कि बिस्तर से उठा ही नहीं जाता

    अन्तर्मुखी हूँ, लोगों से बात करने में हूँ कतराता
    लेकिन भाषण देने का समय आए तो हूँ बहिर्मुखी बन जाता

    मुझे तो लगता था कि मैं कुशल वक्ता हूँ
    पर मेरा बोला हुआ किसी को समझ नहीं आता

    चित्रकारी करता हूँ और फोटोशॉप भी
    पर ये भी कुशलतापूर्वक नहीं कर पाता

    सोशल मीडिया पर योग करके दिखाता हूँ
    पर दो चार आसनों के अतिरिक्त मुझसे कुछ नहीं किया जाता

    बौद्धिक खेल करता हूँ,
    दिमाग के दायें बायें हिस्सों में तालमेल बिठा कर,
    पर इस बढ़ी हुई बौद्धिक क्षमता का,
    सही जगह इस्तेमाल नहीं कर पाता

    सीखता रहता हूँ, दुनिया भर की रचनात्मक कलाएँ
    पर दैनिक जीवनयापन के लिए जो अनिवार्य है, वो नहीं आता

    जो सब कर लेते हैं
    वो मैं नहीं कर पाता

    जो मैं कर पाता हूँ
    वो हर कोई नहीं कर पाता

    एक साथ इतना सब तो कोई नहीं कर पाता
    मैं करता हूँ पर हर कार्य निपुणता से नहीं कर पाता

    शायद इसीलिए कहता हूँ कि मुझे बहुत कुछ आता है
    पर फिर भी यही कहूँगा कि मुझे कुछ नहीं आता

    -Shubham Joshi
    ©ubhayhastkushal