• akarshita29 73w

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    मैं भी उड़ना चाहती हूँ,
    तुम भी वादियों की सैर लगाते हो।
    मैं भी खुलना ,यूँ आगे बढ़ना चाहती हूँ,
    तुम भी समाज की लीकों से आज़ाद होने का ख्वाब देख जाते हो।
    मैं भी खुशियां ओढ़ना चाहती हूँ,
    तुम भी जिंदगी खुलकर जीना चाहते हो।
    मैं भी खुद को खुद का हौसला बनाती हूँ,
    तुम भी खुद को अक्सर खुद से ही आजमाते हो।
    मैं भी खुद की खोज में हूँ,
    तुम भी मेरी फ़िराक में कही दूर निकल जाते हो।
    मैं भी हक़ीक़त को ख़्वाबो के आगे टाल जाती हूँ,
    तुम भी अपने रंधों के सहारे हर ख़्वाब हक़ीक़त में बदल जाते हो।
    जब मैं भी तुम और तुम भी मैं कहलाते हो,
    तो अक्सर बंद पिजड़े को तोड़ तुम मुझे कही दूर छोड़ आज़ाद कर जाते हो।।
    ©akarshita29