• kermech21 31w

    मशाल चाहिए...

    मैं लिखना नहीं चाहता
    इन लाईक्स और शेयर्स की गिनती में उलझना नहीं चाहता
    मिरी रूह तक थरथरा जाती हैं,
    सिर्फ सुनकर, सोचकर!
    तो उसपर क्या बीती होगी?
    क्या मिरी कलम उतनी हिम्मत रखती हैं,
    कि, उसके दर्द को शब्दों में ढाल सके?
    क्या जिल्लत हैं कि हम कुछ कर नहीं सकते,
    सिवा लाईक्स और शेयर्स के!
    क्या इस रात की कोई सुबह होगी?
    या अपने अंधेरों में ही निगलती रहेगी यह,
    कभी निर्भया कभी आसीफा को!
    और हम दुख जताते रहेंगे!
    शुक्र करेंगे हम उनमेंसे नहीं हैं!
    दिया तो जलाएंगे, पर उजाले के लिए नहीं,
    सिर्फ दिखावे के लिए!
    अगर इस रात की सुबह नहीं हैं,
    तो दिये से काम नहीं चलेगा,
    मशालें जलानी होगी,
    जो रात के अंधेरे को चीरकर
    नया उजाला लाये...

    ©kermech21