• abhay_singh426 24w

    "ज़िंदगी"

    ना जाने कैसी ये बेबसी है,
    कैसा ये दर्द है,
    अंदर लगी हैं आग मिलन की,
    दुनिया कहती हैं कि माहौल सर्द है,
    कैसे बतलाऊ इन्हे,
    कि मन कितना अकेला है,
    कैसे बतलाऊ इन्हे,
    कि जिंदगी में लगा दुखो का मेला है,
    रोज़ बुझाती है ज़िंदगी दीपक प्रेम का,
    इसे रोज़ जला रहा हूँ मैं,
    ना जाने कैसे,
    जीवन की टूटती डोर को बुन रहा हूँ मैं,
    दुख भरे इस संसार में,
    ना जाने कैसे,
    खुशी के दो पल चुन रहा हूँ मैं।।

    © लेखक - अभय सिंह
    Instagram - @abhay_writes_