• yashashvigupta_07 6w

    मेरा पुरूष होना मुझे बादल होने का एहसास कराता है
    मैं भी चीखता हूं
    बादलों की गड़गड़ाहट के जैसे
    फिर सन्नाटों को पाकर
    बेहद आहिस्ता से बरसती हैं मेरी आँखे
    कभी-कभी पल भर को
    कभी पूरी रात
    और फिर मैं चला जाता हूं उन सभी के जिंदगी से
    जो मुझे याद रखते हैं मेरी जरूरत तक
    जैसे बारिश ज्यादा होने पर कोसते हैं सभी बादलों को
    मगर बादलों के ही जैसे
    मैं लौट आता हूं देर-सबेर उनकी अपनी जरूरतों की खातिर
    .
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    बादलों की बूंदो को देखकर विरह से जलती प्रेमिकायें
    सुकून पाती हैं, लिखती हैं बारिश पर
    मुझे भी कुछ ख़त मिल जाते हैं
    हाल बयां करने वाले
    कभी-कभी छूटी हुई प्रेमिकायें धिक्कारती हैं बादलों को
    उनके अधूरेपन का उपहास करने के लिये, बरसने के लिये
    कभी-कभी मेरे नाम भी कोई ख़त नहीं आता है
    बादलों की प्रेमिकायें चुप रहती हैं
    खिड़की से उन्हे झांकती हैं
    फिर पर्दे गिरा देती हैं
    ठीक उसी तरह जैसे सालों से मुझे देखती आयी है
    वह सांवली-सी लड़की जिसका मुझे
    नाम तक नहीं पता है...
    उसे देखकर मैं अक्सर नज़रे फेर लेता हूं
    मेरा मन मुझे कचोटता है
    ओह! धिक्कार है मुझे
    और बादलों... तुम्हे भी
    तुम्हारी अनकहीं प्रेमिकाओं की तरफ से
    मेरा नाम कुछ भी न होकर बादल होना था
    हाँ; मेरा पुरूष होना मुझे बादल होने का एहसास कराता है।