• jaun_sumit 24w

    "ग़ज़ल"

    तुझसे बिछड़कर ना-रसाई बहुत है
    ज़िंदगी नाम पर तन्हाई बहुत है

    क्यूँ करें कोई जफ़ा-ए-गिला उससे
    हमने भी तो की बेवफ़ाई बहुत है

    जब तुझे भुलाना चाहा जान-ए-जाँ
    याद दिल-ए-बर्बाद आई बहुत है

    रास्तों से फ़क़त यूं ही नहीं गुज़रे हम
    राह कुचली है खाक़ उड़ाई बहुत है

    रो न पड़े वो हंगाम-ए-हिज्र 'सुमित'
    अब तिरे चलने में भलाई बहुत है

    ©सुमित