• sauravmishra 34w

    "अधूरी तलाश"

    मंद-मंद सी चली हवा
    काली-काली हुई रात जवां
    जो रोग ना पाया जीवन में
    उस रोग संग ही मिली दवा

    उससे टकरा के हुआ यूँ चूर
    टुकड़े कुछ जा के गिरे जो दूर
    उसके माथे था चढ़ा ग़ुरूर
    फ़िर करता क्या मैं था मजबूर

    था स्नेह मेरा हारा-हारा
    मैं पड़ा रहा बिखरा सारा
    हँसती-गाती इस दुनिया में
    मैं भटक रहा था बंजारा

    उसको खोया तो डूब गया
    ख़्वाबों में नीचे खूब गया
    मेरे सपनों की दुनिया में
    उस रंग-भिरंगी बगिया में
    मैंने उसको बैठा पाया
    ना जाने क्यों मैं शरमाया
    देखी उसकी प्यारी काया
    फ़िर याद नहीं कुछ भी आया

    उसके ठोकर को भूल गया
    मैं प्रेम में फिर से कूद गया
    कूदा तो था उसको पाने
    उठ चला-चला वो दूर गया
    लगता था भाग्य फूट गया
    जीवन से जीवन छूट गया
    आखिर क्या था उसमें ऐसा
    जो पल भर में मैं टूट गया

    गहरे सागर की बाहों में
    वन की हरियाली राहों में
    हर पथ मैंने ढूंढा उसको
    ना पाया किसी पनाहों में

    प्राप्त प्रेम का ताप था करना
    साथ था उसके जीना-मरना
    दिल की अपनी दीवारों पर
    रंगों को उसके जो था भरना

    समझ नहीं मेरे आया
    तो थोड़ा सा मैं घबराया
    की कैसे अब मैं सांस भरूँ
    कैसे उसकी मैं आँस करूँ
    तो निकल पड़ा मैं खोज में उसकी
    सोच में डूबा था मैं जिसकी
    मिल कर उसे बतानी थी
    मन कि बतियाँ समझानी थी
    थी हृदय में जो तस्वीर जमी
    वो भी उसको दिखलानी थी...

    ©sauravmishra