• santoshmaddhesia34 5w

    अच्छा लगता है

    अच्छा लगता है मुझको जब मेरा कोई अपना
    अपनेपन का अधिकार दिखाता है
    मुझसे बिना पूछे मेरे सामानों को अपना बनाता
    अच्छा लगता है मुझको जब कोई मेरा अपना
    अपनेपन का अधिकार दिखाता है
    अब तक तो जितने अपने थे सब पराये थे
    हमने भी खुब गुस्ताखी की अपने ही ऊपर
    न ही कोई चलता साथ है सदा
    हमने तो रेत के महल बनाये थे
    अच्छा लगता है मुझको
    जब इस रेत को कोई महकाता है
    अच्छा लगता है मुझको जब मेरा कोई अपना
    अपनेपन का अधिकार दिखाता है,
    ,,,,,,,
    दया क्षमा करुणा का भाव निज जेहन में
    भर कर लाता है
    दुःखी हो यदि कोई उसे भी गले लगाता है
    भुखा जो हो कोई भोजन उसे कराता है
    कभी कभी औरों के सुख के खातिर
    दुःख खुब उठाता है
    अच्छा लगता है मुझको जब मेरा कोई अपना
    ऐसा एहसास जगाता है
    सुबहा की पहली किरण खुद बन जाता है
    हो मौसम धुंधला भी फर्क नहीं पड़ता
    वो साथी जब साथ निभाता है
    दुनिया के सारे सुख फिके हो जाते हैं
    जब बचपन का वो साथी याद आता है
    जी करता है पास बिठा लूं उसको
    कुछ पल के लिए
    पर वो बचपन वाला समय कहा वापस आता है
    अच्छा लगता है मुझको जब मेरा कोई अपना
    अपनेपन का अधिकार दिखाता है
    ,,,,,
    कल्पना के पंखों पर ये मन सवार हो जाता है
    वो सारे खिलौने मिट्टी के बाहर लाता है
    फिर वही मिट्टी का महल तैयार हो जाता है
    चारों तरफ के जगलो को निहार कर
    अति प्रसन्नता को पाता है
    आज के भागदौड़ भरी जिंदगी में
    कहां वो सुख रास आता है
    न जाने कहां हो तुम सबके सब
    हिचकी मेरी तेरे याद करने से आता है
    हैरान तन मन अपने ही आप हो जाता है
    अब तो जो अपना कहते हैं
    वो स्वार्थ का बंधन है
    छुट जाते हैं सभी जब उनका पुरा हो जाता है
    कैसी रीति जगत की कभी जो सम्मान देता है
    बदनाम भी बही खुब करता है
    अब कहां कोई अपना बन पाता है
    अच्छा लगता है मुझको जब मेरा कोई अपना
    अपनेपन का अधिकार दिखाता है
    अनमोल हो जाता है वो मेरे लिए
    जो निस्वार्थ भाव से प्रेम लुटाता है ।।
    ©santoshmaddhesia34