• msr_prose 14w

    Father's Day

    मंज़र चाहे जो भी हो, कितना ही जटिल क्यों न हो,
    हर परिस्थिति में तूने मुझे ढलना सीखा दिया।
    मां ने तो फ़खत मेरी उंगली थामी थी,
    मगर तूने मुझे अपने कदमों पे चलना सीखा दिया।

    इस रंगीन सी दुनिया में अपने दुख को दफ़न कर,
    आंसूओं को पत्थर बना अपने आलिंगन पर मल दिया।
    मैं घूमता था अल्हड़ सा, अधनंगा सा इस जहां में,
    अपनी चमड़ी को चादर बना मेरा लिबास बदल दिया।

    पुख़्ता सी इन राहों पर और चलती दमकती इन सांसों पर,
    ज़िन्दगी की ये बदलती तस्वीर महज़ एक कसौटी है।
    इस जहां की हरकतों को मैंने बहुत आज़मा के देखा,
    मगर नतीज़ा ये पाया कि, तेरे आसमां तले मेरी ज़मीं छोटी है।

    हर पल के लिए अहम तो तूने मुझे बनाया है,
    तेरी वालिदगी को चमन बनाना ख़ुद में ही एक सूफ़ी है।
    और कितना साझा करूं इन चंद पुच्छेले अल्फाजों में,
    तेरी बंदगी को बयां करना समझदारी नहीं, बेवक़ूफ़ी है।
    ©msr_prose