• abhay_singh426 23w

    "ज़िंदगी"

    ना खता तेरी है, ना ज़माने की,
    बस वक़्त के हर सितम को गिन रहा हूँ मैं,
    सब कुछ बड़ी गौर से देख रहा हूँ,
    बहुत लोग दावा किया करते थे,
    मेरे अपने होने का,
    उनके आने का इंतजार कर रहा हूं मैं,
    ना जाने कब से अश्को का सैलाब,
    इस दिल में दबाए बैठा हूँ,
    बस अब नैनो की बरखा का इंतज़ार कर रहा हूँ मैं,
    अगर टूट गया बांध सब्र का,
    ना जाने कितनो को ले डूबूंगा,
    इसी डर में चुप चाप जी रहा हूँ मैं,
    साजिशें हर दिन होती हैं नयी मेरे खिलाफ ज़माने में,
    इस खेल की हर बाज़ी को सुन रहा हूँ मैं,
    दुख भरे इस संसार में,
    ना जाने कैसे,
    खुशी के दो पल चुन रहा हूँ मैं।।

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