• _jiya_ 21w

    उस पायल की झंकार में,
    उस कजरे की धार में,
    मैं आज भी तुम्हें पाता हूँ।

    उन पुराने गीतों में,
    उन अधूरी कविताओं में,
    मैं आज भी तुम्हें सुनता पाता हूँ।

    वो खाली सी सड़कों पर,
    वो बंजर ज़मीं पर,
    मैं तुम्हें आज भी आता देख पाता हूँ।

    वो बड़े-बड़े नैन तुम्हारे,
    वो लम्बे घुन्गराले बाल,
    वो सब; मैं आज भी महसूस कर पाता हूँ।

    उस खाली पड़े चाय के प्याले में,
    उड़ आधी पढ़ी किताब में,
    मैं तुम्हें आज भी चाय को ठंडा करते देख पाता हूँ।

    वो बिखरा हुआ बिस्तर,
    वो सल से भरे कपड़े,
    आज भी तुम्हारी राह ताकते हैं।

    पर ये सब कल्पानाएं
    फिर जी उठेंगी जो बस एक दफ़ा,
    सिर्फ़ एक दफ़ा तुम मुझे नज़र भर देखलो।

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    कल्पानाएं हैं कुछ
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    ©_jiya_