• badnaam_shayar 24w

    मेरा सफर

    गुमनाम सा डगर था।
    अनजान सा शहर था।
    ना राह का पता था।
    ना मंजिल का खबर था।
    कुछ ऐसा मेरा सफर था।
    हां ऐसा ही सफर था।
    दिल में थोडा डर था।
    शायद रात का असर था।
    ना कोई हमारा था।
    और ना कोई हमसफर था।
    कुछ ऐसा मेरा सफर था।
    हां ऐसा ही सफर था।
    मंजिल ही कुछ इसकदर था।
    कि जैसे वो कोई समंदर था।
    ना आगे कोई घर था ।
    और ना पीछे कोई ठहर था ।
    बस सफर ही सफर था।
    कुछ ऐसा मेरा सफर था।
    हां ऐसा ही सफर था।

    ©naarensingh