• shreyah 6w

    मुझे तो रूकना था आख़िरी नज़्म पर ,
    मैं तो लिखती ही जा रही हूं ...
    शिकस्त ही शिकस्त मेरे नाम हो रहे ,
    मैं तो थकती ही जा रही हूं....

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    ...

    " पल भर की एक हलचल में , हफ्ते भर का सुकून रहता है "

    ।। ...कि इतनी जल्द लिखा करते हैं खै़रियत ,
    यकीनन उनकी ख़ैरियत बड़ी नासाज़ होगी ।।

    ....कि चलते-चलते रस्ते पर ,
    अब मेरा नाम पुकारता कोई नहीं ,
    सोचती हूं ...कितनी घायल वो आवाज़ होगी !
    अल्प-विराम का ठहराव हैं , दिल अलग ही बेताब है ,
    यकीनन ये कहानी फिर से कभी आगाज़ होगी !

    " मैं एक भटकी हुई मुसाफिर , वो राह दिखाता क़ासिद "

    उनसे अक्सर विवाद में रहते थे ,
    अब सबसे सहमति रखते हैं ,
    मेरे ये ख़्यालात बड़े नाराज़ हैं !
    रफ्ता-रफ्ता चल रही राब्ता की ,
    इस रफ्तार पे भी अब नाज़ है ,
    फिलहाल सलाम - दुआ तक सीमित है ,
    ये उलफ़त बड़ी चालबाज़ है !

    ।। मुझे इल्म ना हो मोहब्बत का ,
    वो कुछ ख़फ़ा- ख़फ़ा से रहते हैं ।।
    ©श्रेया