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    अनंत कड़ी कथा

    आज कई हजार वर्ष की कड़ी
    जिसमे कई हजार वर्ष छिपे हैं

    हमारी उँगलियाँ वैसी की वैसी
    तीन बाहर को, एक अंदर को

    तीन कमियां बाहर की दिखीं
    तब एक खुद की नजर आयी

    बड़भागी जिन्हे एक तो मिली
    फिरभी तीन तनी हैं बाहर ही

    नतीजा; ढाक के वे तीन पात
    गाँधी जी के बंदर भी तीन ही

    अपने भय की पोटली संभाले
    दूजे की पोटली में छेद करते

    व्यस्त मदमस्त चतुर सुजान हैं
    सौ साल की गलतियां ढूंढते हैं

    गलतियां ढूंढते अपनी 'एक' हैं
    उठती तीन अभी भी सामने हैं