• navika 30w

    कभी-कभी सोचता हूँ,
    फिर इक बार तुम्हारे शहर आऊँगा,
    छुप कर, बिन बताये, बिन बुलाये,
    फिर इक बार किसी जगह में बैठ जाउँगा,
    जहाँ कहीं किसी गोशे में,
    इक क़ुदरत की गोद में
    जिसके पीछे कुछ बूढ़े दरख़्त देह झुकाये खड़े होंगे,
    जिसके आगे कुछ ज़र्द पत्ते बिखरे होंगे,
    और उनके बीच फिर से इक फूल दिख जायेगा,
    जिसे देख कर शायद,
    फिर वो एहसास, फिर वो जज़्बात,
    मेरी जानिब आ भटकेंगे,
    जिन्हें अरसे पहले छोड़ आया था मे कही किसी की सोच मे
    नविका