• sunilgupta 35w

    दोहे
    समय

    चाक समय सा घूमता , माटी बदले रूप ।
    हस्त सृजन में लीन है ,काढे शक्ल अनूप ।

    पावक में तपकर पके, टन-टन बोले बोल ।
    पानी ना पिघला सके ,माटी पाती मोल ।

    तप में इतना तेज है ,माटी कुंभ कहाय।
    पानी भीतर डाल दो ,वह शीतल हो जाय।

    नेक अनेक रूप धरे, पा कलाकार स्पर्श ।
    जगत का कल्याण करें ,बाँटे सब में हर्ष ।

    मिट्टी से धरती बनी, धरती सब की माय।
    माटी कुंभ कलश बने, धरा फसल उपजाय।

    #सुनील_गुप्ता सीतापुर
    #सरगुजा _छत्तीसगढ