• akarshita29 75w

    स्त्री

    बेशक़ ,
    झुकेंगी नज़रें मेरी तुमसे टकराने पर।
    बेशक़ ,
    मेरी हर आहट की पहचान सिर्फ़ तुमसे होगी।
    बेशक़ ,
    मेरी उड़ती जुल्फों पर दिल तुम्हारा मचलेगा।
    बेशक़,
    मेरे झुमकों पर नज़रे टेढ़ी सिर्फ़ तुम करोगे।
    बेशक़,
    मेरी खनकती चूड़ियों की आवाज़ तुम सुन पाओगे।
    बेशक़ ,
    मेरी हर अदा सिर्फ़ तुम्हारे लिए होगी।
    बेशक़ ,
    मैं वो सबकुछ होंगी जो कुछ तुमसे होगा।
    लेक़िन
    जब-जब तुम्हारी नज़रें ,
    तुम्हारी हरकतें
    युँ गुनाहों में तब्दील होंगी।
    जब-जब तुम दरिंदगी पर उतर आओगे।
    और स्त्री मर्यादा की दहलीज़ भूल जाओगे।
    तब इन्ही बेख़ौफ़ नज़रों से तुम्हें खौफ़ दिखाऊंगी।
    इन्हीं खनकती चूड़ियों वाले हाथों से शमशीर उठाऊंगी ।
    अपनी शील मर्यादाओं का दामन छोड़ ।
    तब दिखलाऊँगी तुम्हें अपनी सीमा ,अपनी ताक़त।
    जिसे पार पाना न तुम्हारे बस में था ,न होगा।
    विवश करोगे जब -जब मुझे,
    तब -तब त्यागूँगी मैं शीलता का चोला।
    लूँगी मैं रौद्र स्त्री का अवतार,
    दूँगी तुम्हें तुम्हारे गुनाहों की सज़ा।

    स्त्री हूँ मैं ,
    मेरे आत्मसम्मान से जब -जब खेलोगे।
    तब-तब ,
    अपने प्राणों पर संकट झेलोगे।
    जब- जब खेलोगे,
    मेरी बेबस तकदीर से।
    तब- तब तुम्हारे तक़दीर की ,
    भाग्यविधाता मैं बनूँगी।।
    ©akarshita29