• kumarsaurabh29798 9w

    बचपन

    बचपन में अक्सर पूछते थे बड़े होकर क्या बनना है,
    जवाब अब मिला फिर से बच्चा बनना है,
    बचपन में न कोई जरूरत थी न कोई जरूरी था,
    न कोई मजबूरी थी न कोई ख़्वाब अधूरा था,
    वो बचपन अब कहीं खो गया,
    न जाने कब मैं इतना बड़ा हो गया,
    बचपन की अलग ही रौनक थी,सब खुद में मस्त रहते थे,
    आज सब खुद में व्यस्त रहते हैं,
    गुलाम हुआ फोन का इस कदर आज इंसान,
    और खुद को आजाद कहते हैं,
    याद आती है उन पलों पापा अपने कंधों में घुमाया करते थे,
    याद आते हैं वो पल जब स्कूल के रास्तों में दोस्तों के साथ जाया करते थे,
    गाँव के खेत,गलियारों में दोस्तों के साथ घुमा करते थे,
    माँ लोरी गा कर हमें सुलाती थी,
    अपनी गोद में बिठाती थी,
    रोने का नाटक कर हम अपनी बातें मनवाते थे,
    कभी कभी पेट दर्द,या बुखार के बहाने स्कूल नहीं जाते थे,
    इतवार की एक अलग ही खुशी होती थी,
    वो भी क्या दिन थे,सर्दियों में सिर्फ इतवार को नहाते थे,
    बचपन में हर बात को कह जाते थे,
    आज कही ख्वाहिशें दिल में रह जाती हैं,
    बचपन में एक चोट लगने पर रो जाते जाते थे,
    आज कही जख्म यूँ ही सह जाते हैं,
    एक खिलौना टूटता तो रो जाते थे,
    आज कई ख्वाइशें,उम्मीदें टूटने पर भी रोना नहीं आता है,
    बचपन में जब गिरते थे तो तुरंत उठ जाते थे,
    आज ज़िन्दगी में रास्ते में जब गिरते हैं उठना मुश्किल हो जाता है,
    जी लो इस बचपन जी भर के,ये बचपन बार बार नहीं आता,
    सुकून की बात मत कर ऐ दोस्त बचपन वाला इतवार अब नहीं आता,
    आज आंखे नम हो जाती हैं,
    जब उन पलों की याद आती है,
    वो सुकून की नींद,चैन अब कहीं खो गया,
    न जाने कब मैं इतना बड़ा हो गया,
    कुमार सौरभ