• rajeevsharma_ 45w

    प्रपंच

    आखिर हमें जाना कहाँ है?

    संसार के इस संचलन से
    मनु कोई, विराम ले यदि
    बैठ पीपल-छाँव, प्रथक हो
    नयन मूँदे, ध्यान दे यदि
    समझ में यह आएगा कि-

    कृतार्थ होना चाहे हर जन
    तुष्ट न हो पाए पर मन
    भागता औ' दौड़ता मनु
    देख जग-मरु का कोलाहल
    एक प्रश्न सहजा उठेगा
    चाहता पाना जिसे मनु
    क्या वो केवल मृगतृष्णा है?

    आखिर हमें जाना कहाँ है?

    आदि क्या है? अंत क्या है?
    और तत्पश्चात क्या है?
    क्या ये सृष्टि का सृजन बस
    एक मिथ्या एक मृषा है?
    मानते जो आये अब तक
    मृत्यु ही है आखिरी सच
    क्या वो मन की धारणा है?

    आखिर हमें जाना कहाँ है?

    क्या ये सच है, दूर उस
    आकाश-घर में
    रह रहा कोई श्रेष्ठ है?
    जो अनादि है, जो अनंत है
    जो अजन्मा, जो अमर है
    उससे मन को साधना ही
    एक मनु की साधना है?

    शायद हमें जाना वहाँ है।

    ©rajeevsharma_