• sarfirashayar 35w

    और भी है.....

    ऐ मुसाफ़िर! क्यों ठहर गया?
    तेरी मंज़िल के आगे खड़ा इक सफ़र और भी है।

    तेरी जुबां से निकले लफ्ज़ों के परे,
    आँखों से चीखती इक बेताब-सी आवाज़ और भी है।

    तेरे हज़ार नक़ाबों के पीछे छिपी,
    इक शक्ल-ए-हक़ीकत और भी है।

    गौर से देख, दरिया से बाँहें मिलाते शफ़क के उस पार,
    इक बेगाना-सा अनदेखा जहां और भी है।
    ©sarfirashayar