• philosophic_firefly 6w

    अर्थ

    ये कितना अजीब है ख्वाब और ज़िन्दगी के बीच हकीकत को ढूंढ़ना! कितना अजीब है ख्याल और खामोशी के बीच किसी बात को ढूंढ़ना! मैं अक्सर ही ऐसे कुछ न कुछ ढूंढा करती हूं। और जब ढूंढ़ती हूं तो कुछ न कुछ पा लेने का मन भी करता है। पर हमेशा ऐसा नहीं होता। हरगिज़ नहीं।

    अब जैसे कि प्यार और दोस्ती को ही ले लें। कभी कभी अगर हम इनके दरमियान कुछ ढूंढ़ना चाहें तो कुछ नहीं मिलता। और भला मिलेगा भी तो क्या मिलेगा। कोई एक नई बात जो शायद सुनने में मुनासिब लगे या ना भी लगे। खैर, मैं तो कुछ नहीं कह सकती इस मामले में।

    अब ज़रा सोचिए, अगर देखा जाए तो हम इंसानियत और मजहब के बीच क्या ढूंढ कर लाते हैं? शायद कुछ लाते हैं या कुछ भी नहीं। पर अगर कुछ लाते भी हैं तो वो हमारी आम ज़िन्दगी में कितना असर करता है और कितना नहीं इस पर भी तो ध्यान दिया जाता है। और ये भी देखा जाता है कि कितने लोग उसको मानते हैं और कितने लोग उसका अनुरोध करते हैं। उसके बाद तो जैसे चीज़ें सिमट जाती हैं और फिर समझो उनको ख़तम ही कर दिया जाता है।

    क्या आपको नहीं लगता ये आपका दो दिन का प्यार, तीन दिन का तनाव, चार दिन का अवसाद और पांच दिन का ब्रेकअप भी ख़तम हो ही जाता है। खैर, अगर नहीं लगता है तो आपको ऐसा लगना चाहिए। बल्कि मैं तो ये भी सुझाव देना चाहती हूं कि आपको इस पर अभी से विचार मंथन करने की कोशिश भी करनी चाहिए।

    अच्छा चलिए मैं आपको सही से, विस्तार से समझाती हूं। माना कि आप किसी से प्यार करते हैं। सच्चा वाला या झूठा वाला या जो भी वाला, वो एक ना एक दिन ख़तम ही हो जाना है। चाहे कितना ही गहरा हो आपका प्रेम। कितना ही सुंदर और सरल। पानी के दाम हो ही जाएगा आपका ये प्रेम,
    एक दिन।

    खैर, दूसरी बात ये है आपका तनाव, आपका अवसाद और बाकी का बचा खुचा ब्रेकअप। ये सब एक दिन ख़तम ही हो जाएंगे। और वैसे भी जैसा की मैंने अभी ऊपर बताया की जो चीज़ इंसान के काम ना आए या जो बात इंसानियत को ना भाए वो उसे जल्द ही भुला देती है। और उस चीज का फिर नामो निशान मिट जाता है। सो जो भी हुआ हो उसे भूल जाइए वरना भूलना तो आपको वैसे भी है। और इन चीज़ों का ख़तम होना एकदम लाज़मी।

    आप इन चीज़ों को कितना ही घसीट कर अपने पल्लू से बांध कर जी लें, मगर सच्ची बात तो यही है एक दिन आपको इनसे छुटकारा अपने आप ही मिल जाएगा। और ये तो आपको भी पता होगा की मानव प्रवृत्ति ही यही है कि वो हर चीज़ भूलता रहता है। अच्छा बुरा दोनों।

    चलो अच्छा फिर से वहीं अपने पुराने मतलब की तरफ़ आते हैं। अरे यही कि प्यार हो या उदासी, खयाल हो या उबासी, दिन हो या रात, ब्रेकअप हो या अवसाद। अगर आप इन सब चीजों के बीच रहते रहते इनका कोई अर्थ नहीं निकाल पाते तो समझिए आप गए काम से।

    ये चीजें इसीलिए तो जीवन में पधारती हैं ताकि आप उनके भीतर जाएं तो कुछ समझ पाएं। जीवन के कुछ गूढ़ अर्थों को जान पाएं। उनसे कुछ मतलब निकाल पाएं। मगर ये क्या! आप तो बेवकूफों की तरह उसी में डूब कर वापस चले आए और किसी तरह की कोई खोज नहीं की।

    वाह रे मनुष्य वाह! पर चलो कोई बात नहीं। आगे से ध्यान रखना इस बात का। यही की जो भी करना या कहना उसके दरमियान से कोई कहानी ज़रूर बनाना। जैसे कि मैं करती हूं लिखने और ख़ुद से बात करने के दरमियान ख़ुद को समझ कर।


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