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    विभावरी बेला

    मुक विभावरी बेला को कोकिल के गीत जगाते हैं,
    खग कलरव कर नव प्रकाश का हर्षित गीत सुनाते हैं।
    रात की रानी अंतिम क्षण में भी वायु महकाती है,
    पंख खोल अंगड़ाई लेते शिशु पाटल मुसकाते हैं।

    चंद्र लोक की शीतलता प्रातः का मार्ग सजाती है,
    शीत पवन धरती का मस्तक मंद-मंद सहलाती है।
    जागृत जन नवीन उल्लास का प्रफुल्ल पर्व मनाते हैं,
    और पर्व प्रकाशित करती दिनकर की सवारी आती है।

    है विभावरी बेला पावन, प्रेम प्रतीक दर्शाती है,
    तिमिर-प्रकाश, प्रभात-रात्रि सम बैरी को मिलवाती है।
    त्याग आलस्य जाग बढ़ने का मार्ग सदा दिखलाती है,
    नित नवीन प्रारंभ करने का पाठ हमें सिखलाती है।

    -प्रसन्न कुमार राय
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