• ruchigupta_ 23w

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    वैरागी मन

    दिन का एक पहर है रोशन,
    तो दूजे में है अंधियारा,
    रात -दिन के चक्र ने ,
    जीवन क्या है समझा डाला।
    सांसें भी हैं उठती -गिरती,
    उतार चढ़ाव है मतलब जीवन।
    है मौसम भी बदलता रहता।
    कड़कती धूप आई लेकर गर्मी,
    तोरियां चढ़ गई माथे पर सबकी,
    सूरज को कोसा मैंने,
    हाय !शरीर जला डाला ।
    सर्दी आई ठिठुर गए सब ,
    सूरज की मैं राह निहारूं ।
    वही है "सूरज",
    वही "मैं" हूं ,
    फिर ?
    समझ मे आया ,
    है जरूरत का बोलबाला।
    बारिश की दो बूंदों ने,
    मन की माटी को महकाया ,
    सोंधी सोंधी खुशबू से ,
    वैरागी हो गई मन की काया ।
    दिन -रात हो गए एक,
    अंधकार मन का भागा,
    तपते सूरज में भी,
    वैरागी मन की छाया,
    वैरागी मन की छाया।
    रुचि "हर्ष"।
    ©ruchigupta_