• chandra_mohan_pokhriyal 23w

    कुमकुम

    एक परिपेक्ष्य ये भी:

    सोचती हूँ क्या ये क्या रीत है?
    पाखंड है अन्याय है या फिर प्रीत है?

    क्या धर्म और रीत की मुहर
    प्रेम पर अधिकार दे सकती है?
    पेशानी पे लिखा रोमानी तो है
    पर हमेशा क्या प्यार हो सकती है?

    यह जो अपने अंगुष्ठ से तुमने
    मेरे माथे पर कुमकुम निशान बनाया है
    प्रेम का प्रतीक है ये या
    अपने अधिकार का ऐलान लिखाया है?

    ऐलान जो घोषित करता है
    कि मैं इंसान नहीं एक वस्तु हूँ
    प्रेमपान नहीं है, आचमन में मेरे
    ज़हर है और मैं शायद अरस्तू हूँ

    तुम कहते हो कि ये मेरे माथे पे
    चाँद सूरज सा दमकता है
    यदि औरत के चेहरे पे सजता है
    तो आदमी का भी तो मत्था है

    क्यों तुम मुझे कभी अपना
    मित्र-स्वामी-सखा नहीं मानते?
    सबके नाम का तिलक धारण करते हो
    कभी मेरे नाम का टीका नहीं लगाते

    किसने बनाई ये, क्यों गढ़ी गयी
    कहो चन्द्र ये कैसी रीत है?
    स्वछंद नारी के युग में ये
    पाखंड है अन्याय है या फिर प्रीत है?

    -चन्द्रमोहन पोखरियाल
    ©chandra_mohan_pokhriyal