• _poems_98 5w

    उलझे धागे

    मान लिया कि तुम सच्चे थे
    हर बात के पक्के थे।।

    मान लिया कि आज फिर हम आपके थे
    साथ बैठ गुनगुना रहे थे...

    पर तू मलंग आपनी धुन मे
    तुझे कहाँ खबर थी..

    आज भी इस सुलझे खवाब में
    कुछ धागे आज भी उलझे थे..

    ©_poem_to_remember_