• prahlad_singh_shekhawat 20w

    दाग संस्कार था किसी 'पुतले' का
    था मैं भी उस भीड़ का हिस्सा
    जो बस कर रही थी उछलकूद
    जैसे करते हैं जंगली वानर

    धूम धड़का और पटाखों के शोरगुल में
    जब जलाया गया था उस पुतले को
    साथ में थे उसके दो साथी भी
    तीनो के तीनो एकदम खामोश

    जी ख़ुशी से हिल्लोरे मार रहा था
    धनुर्धर 'राम' बने उन जनाब का
    और दूर खड़ा था एक बच्चा, जिसने
    आज ही सुनी थी कहानी दशहरे की

    'नीर' की भाँती निर्मल था मन उसका
    तो दौडा चला गया चीरते उस भीड़ को
    और निश्छल मन से पूछ बैठा
    के ''आप ही राम हो क्या ?"

    कोई जवाब नहीं था महाशय के पास
    जब झाँक कर देखा खुद के अंदर
    अब मानो वो पटाखों की आवाज़
    बस हंस रही थी 'कलयुगी राम' पर

    अब कहे भी तो क्या उस भगवानरूपी बच्चे से
    सामने जले जा रहा था वो पुतला और
    अंदर राम बना वो एक रावण
    अब तो ख़ामोशी में ही भलाई थी
    ©prahlad_singh_shekhawat