• saketmishra 9w

    बैठा हूँ मैं की लिखू कोई गजल
    पर शब्द नहीं मिल रहे
    कभी आँखे लिखता हूँ तो कभी कमर
    कभी जुल्फ तो कभी नज़र
    पर सभी शब्द उड़े जा रहे
    कागज पर बैठते ही नहीं
    घंटो बीते पर तुक भिड़ती नहीं
    रंग गोरा पर लाली जमती नहीं
    कब से बैठा हूँ मैं लिख कर तेरा नाम
    अब सोचता हूँ
    तेरा नाम ही मुक्कमल है
    उससे बेहतर गजल भला क्या होगी...