• vrushals 23w

    ज़िंदगी कि दौड़

    जिंदगी कि दौड मे,
    सबको दौडते देखा मैने,
    इंसानियत को पीछे रखते,
    सबको जीतते देखा मैंने....

    एक निवाला पाने को,
    लोगोंको भागते देखा मैंने,
    भूक नसीब में जिसके,
    मरते उसको देखा मैंने...

    घरपे भूखे बच्चोंको,
    रेंगते रोते देखा मैंने,
    ज़हर मिले तो खा जाये वो,
    मौत मांगते देखा मैंने...

    पेड़ तले रस्ते पे उसको,
    रोते बिलगते देखा मैंने,
    आँखों से आसुओंको उसके,
    हतेली पे गिरते देखा मैंने....

    बारिश के पानी में उसको,
    कपकपाते देखा मैंने,
    बूढी उंगलिओंको उसकी फिर,
    ठंडसे सिकुड़ते देखा मैंने....

    तन उसका मुरझाया,
    मन को संभलते देखा मैंने,
    चादर ओढ़ाके सुलादो उसको,
    सबको कहकर देखा मैंने...

    कोई नहीं था ज़िंदा वहा,
    सबकी आँखों पे पर्दा देखा मैंने,
    अपना सब अच्छा चले,
    यही कहते सबको देखा मैंने..

    लाश लथपत पड़ी थी उसकी,
    बूढ़े कांधे पे उसके देखा मैंने,
    भूक प्यास से ज़िन्दगी में,
    सौदा करते उसको देखा मैंने...

    मौत पाकर ज़िन्दगी में,
    हस्ते हुए उसको देखा मैंने,
    मुर्दो की इस बस्तीसे,
    ज़िंदा उसको होते देखा मैंने...
    ©वृषाल