• sanjay_writes 31w

    कब तक खुद से दग़ा करता रहूँ मैं।
    कब तक सपनो मे जीता रहूँ मैं।
    अंधेरों कि फिकि मुस्कान के लिये ।
    कब तक अश्को को पीता रहूँ मैं ।

    पलकों मे छिपे आँसु पूछते है मुझसे ।
    क्योँ हमे बहनें नही देता ।
    होंठों मे छिपा दर्द पूछता है मुझसे ।
    क्योँ मुझे कहने नही देता ।

    कब तक दिल कि आवज़ अनसुनी करता रहूँ मैं।
    कब तक सपनो मे जीता रहूँ मैं।
    अंधेरों कि फिकि मुस्कान के लिये ।
    कब तक अश्को को पीता रहूँ मैं ।

    आंधियाँ आती है तुफ़ान आते है ।
    पलकों मे छिपे मोती गिरना चाहते है ।
    तडपती रूह सिसकति आँहे ।
    हर कदम पे दम तोडती मेरी राहें।

    कब तक उन राहों को ढूँढता रहूँ मैं
    कब तक सपनो मे जीता रहूँ मैं।
    अंधेरों कि फिकि मुस्कान के लिये ।
    कब तक अश्को को पीता रहूँ मैं ।

    छाया है घनघोर अँधेरा ।
    पास नही कोई भी मेरा ।
    घुट घुट कर जिने को मजबुर ।
    काँपता है ये दिल मेरा ।

    कब तक टूटे दिल कि धडकनें सुनता रहूँ मैं।
    कब तक सपनो मे जीता रहूँ मैं।
    अंधेरों कि फिकि मुस्कान के लिये ।
    कब तक अश्को को पीता रहूँ मैं ।

    काँटे किस्मत मे है बहुत मगर बाहारौ की उम्मीद को मिटाये कैसे ।
    जो नही हमारे बस मे उसकी चाहत को घटायें कैसे ।
    चढते सूरज को करते है सब सलाम । ढुब्ते सूरज को भला खिदमत मे हम लाये कैसे ।
    वो तो नादान है समुद्र को समझते है तालाब । कितनी गहराई है साहिल मे बातयेंगे कैसे ।

    कब तक अँधेरी रातों मे रोशनियों का इंतज़ार करता रहूँ मैं ।
    कब तक सपनो मे जीता रहूँ मैं।
    अंधेरों कि फिकि मुस्कान के लिये ।
    कब तक अश्को को पीता रहूँ मैं ।

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    जरूरत